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शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

आल्हा :एक वीर बुन्देला

जीवनभर भीषण युद्धो और लड़ाइयों से जूझने वाले एक वीर सैनिक ने 
शारदा देवी की 12 वर्षो तक साधना करके अमर होने का वरदान पा लिया। 
आज भी उसकी अमरता के चर्चे बुंदेलखंड में लोगों की जुबान पर है। 
बुदेलखंड की वीरता का इतिहास रचने वाला यह योद्धा कोई और नहीं, 
बल्कि आल्हा था, जिसने जीवनभर दिल्ली के तख्त पर बैठे पृथ्वीराज चौहान 
के खिलाफ संघर्ष किया। पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ जब दोनों भाई आल्हा और ऊदल संघर्ष कर रहे थे, उसी दौरान वे एक दिन त्रिकूट पहाड़ी के घने जंगल से गुजर रहे थे, तभी उन्हें एक स्थान पर एक देवी की प्रतिमा मिली।

कहा जाता है कि देवी प्रतिमा को सबसे पहले आल्हा ने ही देखा।
इसके बाद से ही दोनों भाई शारदा देवी के अनन्य भक्त बन गए।
आल्हा ने यहां 12 वर्ष तक कड़ी साधना करके देवी से वरदान में अमरत्व पा लिया। कुछ लोगों के बीच यह भी किवदंती प्रचलित है कि आल्हा ने देवी को अपनी जीभ अपनी ही तलवार से काटकर चढ़ा दी थी,
जिससे प्रसन्न होकर देवी ने उसे अमर रहने का वरदान दिया था।
जिस प्रतिमा को आल्हा ने घने जंगल में पाया, उसे शारदा माई का नाम भी
आल्हा ने ही दिया था। इसके बाद देवीजी का लोकप्रिय शारदा मां हो गया है।

बुंदेलखंड के लोगों के बीच किवदंती प्रचलित है कि अमरत्व का वरदान पाने वाला आल्हा आज भी जीवित है और अपनी इष्टदेवी मां शारदा की पूजा करने यहां मप्र के सतना जिले में स्थित मैहर मंदिर में हर दिन सुबह ४ बजे आता है। यह भी कहा जाता है कि मैहर की शारदा देवी उनकी आराध्या हैं
और हर रोज सुबह देवी के गले में ताजे फूलों की माला मिलती है।
जाहिर है यह माला आल्हा द्वारा ही चढ़ाई जाती है।

मप्र के सतना जिले में स्थित मैहर में लाखों देवी भक्त पूरे साल आते रहते हैं।
शारदा देवी मंदिर के पीछे ही एक छोटा तालाब है, जिसे आल्हा पोखरा या आल्हा तालाब के नाम से जाना जाता है।
आल्हा के नाम से जाना जाने वाला यह तालाब इस ओर इंगित करता है कि आल्हा का गहरा संबंध यहां से था।
शारदा मां मंदिर के पीछे बने आल्हा पोखर के पीछे ही २ किमी दूर एक अखाड़ा है, जहां दोनों भाई आल्हा और ऊदल कुश्ती का अभ्यास करते थे।





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